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सासू माँ के आने से पलट गई किस्मत

Başlatan thomasott130, Haz 13, 2026, 08:36 ös

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thomasott130

मेरी पत्नी का नाम नेहा है। शादी को चार साल हो गए हैं। हम दोनों की ज़िन्दगी एक तयशुदा रूटीन में चल रही थी। सुबह उठो, ऑफिस जाओ, लौटो, डिनर करो, सो जाओ। कहीं कोई रोमांच नहीं था। न कोई नई प्लानिंग, न कोई चर्चा। फिर एक दिन नेहा ने बताया, "सासू माँ चार दिन के लिए आ रही हैं।"

मेरे होश उड़ गए।

सासू माँ यानी मेरी सास। एक बेहद शांत और प्यार करने वाली महिला, पर उनकी एक आदत है--वो हर चीज़ पर अपनी राय देती हैं। टीवी पर क्या आ रहा है, हम क्या खा रहे हैं, मैं कितना पानी पी रहा हूँ, सब पर नज़र। नेहा उनके आने से पहले ही घर साफ करने में लग गई। मैं सोच रहा था कि चार दिन कैसे कटेंगे।

पहले दिन सब ठीक रहा। दूसरे दिन शाम को मैं ऑफिस से थका-हारा आया तो देखा कि सासू माँ ने हमारे लिविंग रूम का फर्नीचर ही बदल दिया था। "बेटा, ये सोफा यहाँ अच्छा नहीं लगता। ये रखो वहाँ।" मैंने मन ही मन ठंडी साँस ली। रात को सब सो गए। मैं बोर हो रहा था। टीवी पर कुछ अच्छा नहीं आ रहा था। फोन उठाया तो याद आया, एक पुराने दोस्त ने पिछले हफ्ते कुछ कहा था।

उसने बताया था कि वो कैसीनो गेम्स खेलता है। उस समय मैंने उसे अनसुना कर दिया था। पर उस रात सासू माँ के कारण घर में ऐसा माहौल था कि मैं कुछ देर के लिए उस दुनिया में भागना चाहता था। मैंने उस दोस्त को मैसेज किया। उसने तुरंत जवाब दिया। उसने एक लिंक भेजा और लिखा, "ये Vavada का नया mirror है। ये अभी चालू है।"

लिंक खोला। अकाउंट बनाने में पाँच मिनट लगे। मैंने सोचा, क्यों न कुछ नया किया जाए? बस टाइमपास। मैंने 200 रुपये डाले। इतने कम कि अगर गए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

शुरू में कुछ नहीं हुआ। दो बार दबाया, 30-30 रुपये गए। फिर एक छोटा सा स्लॉट खोला, जिसमें फल और घंटियाँ थीं। पुरानी यादों वाला डिज़ाइन। मैंने एक बार दबाया। कुछ नहीं। दूसरी बार दबाया। तभी स्क्रीन पर तीन घंटियाँ आ गईं। मुझे समझ नहीं आया कि ये अच्छा है या बुरा। अचानक बैलेंस उछलने लगा। 200, 400, 800, 1600।

मैं चुपचाप देखता रहा। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। मैंने तुरंत पैसे निकालने का बटन दबा दिया। 1,400 रुपये मेरे खाते में आ गए (200 निकालकर)। इतनी तेजी से पैसे आए कि मुझे यकीन नहीं हुआ। उस रात मैं मुस्कुराते हुए सोया।

अगले दिन सासू माँ ने पूछा, "बेटा, तुम बहुत खुश क्यों लग रहे हो?" मैंने कहा, "ऑफिस में कुछ अच्छा हुआ माँ।" असली वजह तो वो पैसे थे। और अंदर ही अंदर मैं फिर से खेलने की सोच रहा था।

रात हुई। सासू माँ सो गईं। नेहा भी। मैंने फिर से मोबाइल उठाया। इस बार मैं बड़ा दांव लगाने वाला था। मैंने पिछली जीत का 700 रुपये रखे और एक नए गेम में कूद पड़ा। ये कार्ड वाला खेल था। पहला दांव लगाया, जीत गया। दूसरा, हार गया। तीसरा, फिर जीत गया। 700 से 1,100 हुए। मैंने लालच में आकर 500 का दांव लगाया। हार गया। फिर से 500, हार गया। अब बैलेंस महज 100 रह गया था। मैं टूट गया। सासू माँ के तनाव के ऊपर ये नुकसान।

मैंने फोन नीचे रखा और सो गया।

लेकिन असली ट्विस्ट तीसरे दिन आया। सासू माँ ने सुबह चाय बनाई और मेरे पास आकर बैठ गईं। उन्होंने कहा, "बेटा, मैंने कल रात देखा तुम बहुत देर तक फोन पर कुछ खेल रहे थे। नेहा को पता है?"

मेरा दिल बैठ गया। मैंने झूठ बोला, "बस एक गेम था, माँ।" वो मुस्कुराईं। फिर बोलीं, "मैं भी जवान थी। मुझे भी कभी-कभी ऐसा लगता था कि सब कुछ एक ही रात में बदल जाएगा। पर एक बात बताऊँ? मैंने सीखा कि खेल तब तक सुंदर है जब तक वो खेल है, ज़िन्दगी नहीं।"

बस इतना कहकर वो उठकर रसोई में चली गईं। मैं वहीं सोच में पड़ गया। उस दिन मैंने फैसला किया। मैं लालच नहीं करूंगा। मैंने Vavada का नया mirror एक बार फिर खोला, पर इस बार पूरी तैयारी के साथ। मैंने सिर्फ 300 रुपये डाले। और तय किया कि इससे ज्यादा कभी नहीं डालूंगा, चाहे कुछ भी हो।

उस शाम मैंने धीरे-धीरे, बिना जल्दी के खेला। दो घंटे में मैंने कुल 850 रुपये का प्रॉफिट कमाया। हर बार 50-100 रुपये की छोटी जीत। मैंने रुकना सीखा। जब लगा कि बस अब और नहीं, तो मैंने लॉगआउट कर दिया।

सासू माँ जाने से पहले मुझसे मिलीं। बोलीं, "बेटा, अब देखता हूँ कब फिर आऊँ।" मैंने कहा, "जल्दी आइएगा माँ।" और हैरानी की बात ये थी कि मैं सच कह रहा था। उनके आने से मैंने खुद को बेहतर तरीके से जाना। उन्होंने मुझे एक ऐसी बात सिखाई जो कोई किताब नहीं सिखाती--सीमा।

अब हर रात मैं अपने लिए एक टाइमर लगाता हूँ। ठीक 30 मिनट। चाहे जीतूं चाहे हारूं, घंटी बजते ही फोन बंद। मेरी पत्नी ने पूछा, "तुम इतना शांत कैसे हो गए?" मैंने कहा, "सासू माँ का आशीर्वाद।"

यकीन मानिए, कैसीनो में हारने से बड़ा खतरा जीतने के बाद का अहंकार होता है। मैंने वो अहंकार छोड़ दिया। अब मैं बस मौज करता हूँ। हर बार जब मैं Vavada का नया mirror खोलता हूँ, तो सोचता हूँ--ये एक और मौका है खुद पर काबू पाने का, न कि दुनिया को हराने का। सासू माँ अब भी कभी-कभी फोन करके पूछती हैं, "ठीक हो बेटा?" मैं कहता हूँ, "बिल्कुल ठीक, माँ। खेल रहा हूँ, पर खेल मुझे नहीं खेल रहा।"

वो हँसती हैं। मैं भी। और शायद यही असली जीत है।


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